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एक साधे सब सधे

एक बार की बात है एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ लगा दिया वह वस्तु उसकी हो जाएगी ! इस घोषणा को सुनकर सभी नगरवासी रात को ही नगर के दरवाज़े पर बैठ गए और सुबह होने का इंतजार करने लगे ! सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं अमुक  वस्तु को हाथ लगाऊंगा ! कुछ लोग कहने लगे मैं तो स्वर्ण को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग कहने लगे कि मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग घोड़ों के शौक़ीन थे और कहने लगे कि मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग हाथीयों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे , कुछ लोग कह रहे थे कि  मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग कह रहे थे कि राजा की रानियाँ बहुत सुन्दर है मैं राजा की रानीयों को हाथ लगाऊंगा , कुछ लोग राजकुमारी को हाथ लगाने की बात कर रहे थे ! कल्पना कीजिये कैसा अद्भुत दृश्य होगा वह !!



उसी वक्त महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगाने दौड़े ! सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाएँ और सबके मन में यह डर भी था कि  कहीं मुझ से पहले कोई दूसरा मेरी मनपसंद वस्तु को हाथ ना लगा दे !
राजा अपने सिंघासन पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था ! कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था और कोई किसी वस्तु को हाथ लगा रहा था ! उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी सी लड़की आई और राजा की तरफ बढ़ने लगी ! राजा उस लड़की को देखकर सोच में पढ़ गया और फिर विचार करने लगा कि  यह लड़की बहुत छोटी है शायद यह मुझसे कुछ पूछने रही है ! वह लड़की धीरे धीरे चलती हुई राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया ! राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गयी !
जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन लोगों ने गलती की ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमे हररोज मौका देता है और हम हररोज गलती करते है ! हम ईश्वर को हाथ लगाने अथवा पाने की बजाएँ ईश्वर  की बनाई हुई संसारी वस्तुओं की कामना करते है और उन्हें प्राप्त करने के लिए यत्न करते है पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि  यदि ईश्वर हमारे हो गए तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी !

ईश्वर  बिलकुल माँ की तरह ही है , जिस प्रकार माँ अपने बच्चे को गोदी में उठाकर रखती है कभी अपने से अलग नहीं होने देती ईश्वर  भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही खेल खेलते है ! जब कोई बच्चा अपनी माँ को छोड़कर अन्य खिलौनों के साथ खेलना शुरू कर देता है तो माँ उसे उन खिलौनों के खेल में लगाकर अन्य कामों में लग जाती है ठीक इसी प्रकार जब हम ईश्वर को भूलकर ईश्वर  की बनाई हुई वस्तुओं के साथ खेलना शुरू कर देते है तो ईश्वर  भी हमे उस माया में उलझाकर हमसे दूर चले जाते है पर कुछ बुद्धिमान मनुष्य ईश्वर  की माया में ना उलझकर ईश्वर में ही रमण करते है और उस परम तत्व में मिल जाते है फिर उनमें और ईश्वर  में कोई भेद नहीं रहता ! इसी बात को गुरु ग्रन्थ साहिब में इन शब्दों में कहा गया है -

" जाके वश खान सुलतान , ताके वश में सगल जहान "

अर्थ - जिसके वश में ईश्वर  होते है उसके वश में सारी दुनियाँ  होती है !
एक बार रामकृष्ण परमहंस और उनके एक गुरुभाई के मन में वशीकरण विद्या सिखने का विचार आया ! दोनों ने ही वशीकरण साधना शुरू कर दी और साधना पूर्ण होने  पर रामकृष्ण परमहंस जी के गुरु भाई ने एक सुन्दर स्त्री को प्रयोग करने के लिए चुना और रामकृष्ण ने परमसुन्दरी माँ जगदम्बा काली पर वशीकरण मंत्र का प्रयोग किया ! परिणामस्वरुप रामकृष्ण परमहंस जी जब भी माँ काली के दर्शनों की कामना करते तो माँ काली प्रकट हो जाती और उनके गुरुभाई का सुन्दर स्त्रियों के मायाजाल में फंसकर सर्वनाश हो गया ! इसलिए ईश्वर से प्रेम करो और ईश्वर को पाने की इच्छा रखो, ईश्वर  की बनाई वस्तुएं अपने आप तुम्हारी हो जाएँगी !

कुरान शरीफ की आयत--कुदुसी में कुछ इस प्रकार ईश्वर ने फ़रमाया है 
इब्न--आदम 
एक तेरी चाहत है और एक मेरी चाहत है , मगर होगा वोही जो मेरी चाहत है 
पर अगर तू ने सुपुर्द कर दिया उसके  , जो मेरी चाहत है 
तो में बक्श दूंगा वोह भी , जो तेरी चाहत है 
पर अगर तू ने नाफ़रमानी की उस की , जो मेरी चाहत है 
तो मैं छीन लूँगा तुझसे , जो तेरी चाहत है 
फिर होगा वही , जो मेरी चाहत है 

जय सदगुरुदेव ... !! 

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